सीखी हैं ? आज भी दूर के गांवों में लकड़ी के और ईंटों के पुराने काम देख आओ। कलकत्ते के बढ़ई एक जोड़ा तब नहीं तैयार कर सकते हैं। दरवाजा क्या-सिटकनी तक नहीं बना सकते। वह बढ़ईपन तो अब केवल अंगे्रज़ी औजारों को खरीदने ही में रह गया है।’’
‘‘जिसके पास धन है, उनका घर देखने की चीज होता है, ‘‘कला में ध्यान प्रधान वस्तु पर केंद्रित होना चाहिए। नाटक सब कलाओं में कठिनतम है। उसमें दो चीजों को संतुष्ट करना पड़ता है-पहले कान, दूसरे आंख।’’ और कहा है,
सीखी हैं ? आज भी दूर के गांवों में लकड़ी के और ईंटों के पुराने काम देख आओ। कलकत्ते के बढ़ई एक जोड़ा तब नहीं तैयार कर सकते हैं। दरवाजा क्या-सिटकनी तक नहीं बना सकते। वह बढ़ईपन तो अब केवल अंगे्रज़ी औजारों को खरीदने ही में रह गया है।’’
‘‘जिसके पास धन है, उनका घर देखने की चीज होता है, ‘‘कला में ध्यान प्रधान वस्तु पर केंद्रित होना चाहिए। नाटक सब कलाओं में कठिनतम है। उसमें दो चीजों को संतुष्ट करना पड़ता है-पहले कान, दूसरे आंख।’’ और कहा है,