योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

‘‘वास्तविक कला की उपमा लिली से दी जा सकती है, जो पृथ्वी से उत्पन्न होती

235 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

है, उसी से अपना खाद्यय पदार्थ ग्रहण करती है, उसके संस्पर्श में रहती है, किन्तु फिर भी उससे ऊपर ही उठी रहती है। इसी प्रकार कला का भी प्रकृति से सम्पर्क होना चाहिए, क्योंकि यह सम्पर्क न रहने पर कला का अधःपतन हो जाता है ?’’

(यही, 43)

भावरिक्त कला, कला नहीं है। वे लिखते हैं, ‘‘वास्तु और साधारण इमारत में अंतर यह है कि प्रथम एक भाव व्यक्त करता है,


1178 of 1197

‘‘वास्तविक कला की उपमा लिली से दी जा सकती है, जो पृथ्वी से उत्पन्न होती

235 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

है, उसी से अपना खाद्यय पदार्थ ग्रहण करती है, उसके संस्पर्श में रहती है, किन्तु फिर भी उससे ऊपर ही उठी रहती है। इसी प्रकार कला का भी प्रकृति से सम्पर्क होना चाहिए, क्योंकि यह सम्पर्क न रहने पर कला का अधःपतन हो जाता है ?’’

(यही, 43)

भावरिक्त कला, कला नहीं है। वे लिखते हैं, ‘‘वास्तु और साधारण इमारत में अंतर यह है कि प्रथम एक भाव व्यक्त करता है,


1178 of 1197