साधारणतः वे ऐसे होते हैं, जिन्हें घर वाले भी निकम्मा समझ कर निराश हो गये हैं। इन व्यक्तियों से आप कैसे कला-कृतियों की आशा कर सकते हैं ? संुदर चित्र बनाने के लिए भी उतनी ही प्रतिभा लगती है, जितनी एक श्रेष्ठ साहित्यिक कृति में।
प्रश्न-तो फिर इस चित्र में श्रीकृष्ण का चित्रण कैसा होना चाहिए था ?
स्वामीजी-श्रीकृष्ण का चित्रण वैसा ही होना चाहिए, जैसे वे थे-गीता के मूर्त-स्वरूप। उस समय वे किंकर्तव्यविमूढ़ मोहग्रस्त और कापुण्यदोषोपहत अर्जुन को धर्म का उपदेश कर रहे थे,
साधारणतः वे ऐसे होते हैं, जिन्हें घर वाले भी निकम्मा समझ कर निराश हो गये हैं। इन व्यक्तियों से आप कैसे कला-कृतियों की आशा कर सकते हैं ? संुदर चित्र बनाने के लिए भी उतनी ही प्रतिभा लगती है, जितनी एक श्रेष्ठ साहित्यिक कृति में।
प्रश्न-तो फिर इस चित्र में श्रीकृष्ण का चित्रण कैसा होना चाहिए था ?
स्वामीजी-श्रीकृष्ण का चित्रण वैसा ही होना चाहिए, जैसे वे थे-गीता के मूर्त-स्वरूप। उस समय वे किंकर्तव्यविमूढ़ मोहग्रस्त और कापुण्यदोषोपहत अर्जुन को धर्म का उपदेश कर रहे थे,