के दिन यदि घर के आंगन और भीतर पर चावल के पीठा से सुंदर चित्र बनाना जानती है, तो उसकी
237 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
कितनी प्रशंसा होती है, श्री रामकृष्ण स्वयं कितने महान कलाकार थे।
प्रश्न-अंगे्रज़ों की कला भी अच्छी है, क्या नहीं है ?
स्वामीजी-तुम कितने जड़ मूर्ख हो ! पर तुम्हें दोष देने से क्या लाभ ?
जबकि सर्व-साधारण की यही धारणा है ? अफसोस ! आज देश की यह दशा हो गई है ! आज हम अपने सोने को तो पीतल समझ बैठे हैं,
के दिन यदि घर के आंगन और भीतर पर चावल के पीठा से सुंदर चित्र बनाना जानती है, तो उसकी
237 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
कितनी प्रशंसा होती है, श्री रामकृष्ण स्वयं कितने महान कलाकार थे।
प्रश्न-अंगे्रज़ों की कला भी अच्छी है, क्या नहीं है ?
स्वामीजी-तुम कितने जड़ मूर्ख हो ! पर तुम्हें दोष देने से क्या लाभ ?
जबकि सर्व-साधारण की यही धारणा है ? अफसोस ! आज देश की यह दशा हो गई है ! आज हम अपने सोने को तो पीतल समझ बैठे हैं,