तो देखो-इस देश के प्राचीन भग्नावशेषों को देखो-उनके देखने भर ही से मालूम होता है, उनमें कितने भाव भरे हैं कितनी कला भरी है। उनका जलपात्र है-कांच का गिलास, पर हमारा घातु निर्मित लोटा-दोनों में कौन कलापूर्ण है ? तुमने देहातो में किसानों के घर देखे हैं ?
मैं-जी हां, अवश्य ।
स्वाजीजी-उनमें क्या देखा ?
मेरी समझ में नहीं आया क्या कहं ? फिर भी मैंने उत्तर दिया-‘‘महाराज । वे अत्यन्त साफ-सुथरे होते हैं और रोज़ रोज उनका आंगन लीपा पोता जाता है।
तो देखो-इस देश के प्राचीन भग्नावशेषों को देखो-उनके देखने भर ही से मालूम होता है, उनमें कितने भाव भरे हैं कितनी कला भरी है। उनका जलपात्र है-कांच का गिलास, पर हमारा घातु निर्मित लोटा-दोनों में कौन कलापूर्ण है ? तुमने देहातो में किसानों के घर देखे हैं ?
मैं-जी हां, अवश्य ।
स्वाजीजी-उनमें क्या देखा ?
मेरी समझ में नहीं आया क्या कहं ? फिर भी मैंने उत्तर दिया-‘‘महाराज । वे अत्यन्त साफ-सुथरे होते हैं और रोज़ रोज उनका आंगन लीपा पोता जाता है।