स्वामीजी-क्या तुमने अन्न-भंडार देखे हैं ? उनमें कितनी कला है। उनकी मिट्टी की दीवालों पर भी कितने प्रकार के चित्र बने हैं। और जरा पाश्चात्य देशो में जाकर देखो, निम्न वर्ग के लोग किस तरह रहते हैं। तब तुम्हें मालूम होगा कि दोनों में कितना महान अंतर है। उनका आदर्श है उपयोगिता, हमारा है कला। पश्चिम का वासी हर वस्तु में उपयोगिता ढूंढ़ता है और हम कला। पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त कर हमने कलापूर्ण लोटा तो फेंक दिया और उसके स्थान
स्वामीजी-क्या तुमने अन्न-भंडार देखे हैं ? उनमें कितनी कला है। उनकी मिट्टी की दीवालों पर भी कितने प्रकार के चित्र बने हैं। और जरा पाश्चात्य देशो में जाकर देखो, निम्न वर्ग के लोग किस तरह रहते हैं। तब तुम्हें मालूम होगा कि दोनों में कितना महान अंतर है। उनका आदर्श है उपयोगिता, हमारा है कला। पश्चिम का वासी हर वस्तु में उपयोगिता ढूंढ़ता है और हम कला। पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त कर हमने कलापूर्ण लोटा तो फेंक दिया और उसके स्थान