में हमारे घर में विदेशी ताम चीनी के गिलास विराजमान हो गये हैं। हमने इस उपयोगितावाद
238 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
के आदर्श को इस सीमा तक अपना लिया है कि अब वह हास्यास्पद लगता है। अब हमें उपयोगिता और कला के समन्वय की आवश्यता है। जापान यह समन्वय लाने में जल्दी सफल हो गया और उसने अभूतपूर्व प्रगति कर ली ! अब जापान पाश्चात्य देशों को भी सिखाने की क्षमता रखता है।’’ (पृष्ठ 235-36)
हम देख चुके हैं कि स्वामी जी की बुद्वि
में हमारे घर में विदेशी ताम चीनी के गिलास विराजमान हो गये हैं। हमने इस उपयोगितावाद
238 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
के आदर्श को इस सीमा तक अपना लिया है कि अब वह हास्यास्पद लगता है। अब हमें उपयोगिता और कला के समन्वय की आवश्यता है। जापान यह समन्वय लाने में जल्दी सफल हो गया और उसने अभूतपूर्व प्रगति कर ली ! अब जापान पाश्चात्य देशों को भी सिखाने की क्षमता रखता है।’’ (पृष्ठ 235-36)
हम देख चुके हैं कि स्वामी जी की बुद्वि