एकपक्षीय नहीं थी। वे पश्चिम के दोष को दोष और गुण को गुण कहते थे। पाश्चात्य संगीत के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा:
‘‘स्वामी जी-पाश्चात्य संगीत बहुत उत्कृष्ट है। उसमें गीत माधुरी, लय उस चरम सीमा को प्राप्त हो चुकी है, जो हमारे संगीत में नहीं है। यह और बात है कि हमारे अनाभ्यस्त कानों को पाश्चात्य संगीत रूचीकर प्रतीत नहीं होता और हम सोचते हैं कि वे सयारों के समान चिल्लाते हैं। पहले मेरा भी यही ख्याल था; पर जब मैंने उसके
एकपक्षीय नहीं थी। वे पश्चिम के दोष को दोष और गुण को गुण कहते थे। पाश्चात्य संगीत के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा:
‘‘स्वामी जी-पाश्चात्य संगीत बहुत उत्कृष्ट है। उसमें गीत माधुरी, लय उस चरम सीमा को प्राप्त हो चुकी है, जो हमारे संगीत में नहीं है। यह और बात है कि हमारे अनाभ्यस्त कानों को पाश्चात्य संगीत रूचीकर प्रतीत नहीं होता और हम सोचते हैं कि वे सयारों के समान चिल्लाते हैं। पहले मेरा भी यही ख्याल था; पर जब मैंने उसके