संगीत को ध्यानपूर्वक सुनना शुरू किया और उस शास्त्र का अध्ययन किया, तो प्रशंसा किये बग़ैर न रह सका। सभी कलाओं का यही हाल है। किसी उत्कृष्ट चित्र पर एक दृष्टि डालकर हम यह नहीं समझ सकते कि उसका सौंदर्य कहां छिपा है। जब तक चित्र कला में निपुणता प्राप्त न हो, तब तक किसी कला-कृति का मर्म समझना कठिन है। हमारा संगीत केवल कीर्तन और धु्रपद ही में शुद्व रूप में जीवित है। शेष सब इस्लामी संगीत-कला के अनुकरण से दूषित हो गया है। क्या
संगीत को ध्यानपूर्वक सुनना शुरू किया और उस शास्त्र का अध्ययन किया, तो प्रशंसा किये बग़ैर न रह सका। सभी कलाओं का यही हाल है। किसी उत्कृष्ट चित्र पर एक दृष्टि डालकर हम यह नहीं समझ सकते कि उसका सौंदर्य कहां छिपा है। जब तक चित्र कला में निपुणता प्राप्त न हो, तब तक किसी कला-कृति का मर्म समझना कठिन है। हमारा संगीत केवल कीर्तन और धु्रपद ही में शुद्व रूप में जीवित है। शेष सब इस्लामी संगीत-कला के अनुकरण से दूषित हो गया है। क्या