योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

इस विदेशी आक्रमण से अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं की रक्षा करनी थी, क्योंकि राष्ट्रीयता का विकास उन्हीं के आधार पर सम्भव था और राजनीतिक लड़ाई भी उन्हीें के आधार पर लड़ी जा सकती थी।

इसी विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण के प्रतिक्रियास्वरूप उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ ही में पुनर्जागरण की चेतना का प्रादुर्भाव हुआ, जिसके प्रथम प्रवक्ता राजा राममोहन राय और अंतिम विवेकानन्द थे। रूपक की भाषा में यों कह लीजिए कि विवेकानन्द पुनर्जागरण के सुविकसित कमल थे-सुन्दर भी और सुगंधित भी।


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इस विदेशी आक्रमण से अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं की रक्षा करनी थी, क्योंकि राष्ट्रीयता का विकास उन्हीं के आधार पर सम्भव था और राजनीतिक लड़ाई भी उन्हीें के आधार पर लड़ी जा सकती थी।

इसी विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण के प्रतिक्रियास्वरूप उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ ही में पुनर्जागरण की चेतना का प्रादुर्भाव हुआ, जिसके प्रथम प्रवक्ता राजा राममोहन राय और अंतिम विवेकानन्द थे। रूपक की भाषा में यों कह लीजिए कि विवेकानन्द पुनर्जागरण के सुविकसित कमल थे-सुन्दर भी और सुगंधित भी।


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