योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

त्याग और प्रेम में न केवल मानवों को वरन् देवों को भी पीछे छोड़ दिया होगा। मैं मुग्ध भाव से उनकी महत्ता का चिंतन कर ही रहा था कि उस अरूप प्रकाश-क्षेत्र के एक अंश ने घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु का रूप ग्रहण कर लिया। वह शिशु एक ऋषि के समीप आकर उनके गले से लिपटकर मधुर स्वर से पुकारता हुआ समाधि से जगाने का प्रयत्न करने लगा। समाधि से जागकर ऋषि ने अपने अद्र्वोन्मीलित नेत्र शिशु पर स्थित कर दिए। उनकी वात्सल्यभरी मुद्रा से स्पष्ट


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त्याग और प्रेम में न केवल मानवों को वरन् देवों को भी पीछे छोड़ दिया होगा। मैं मुग्ध भाव से उनकी महत्ता का चिंतन कर ही रहा था कि उस अरूप प्रकाश-क्षेत्र के एक अंश ने घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु का रूप ग्रहण कर लिया। वह शिशु एक ऋषि के समीप आकर उनके गले से लिपटकर मधुर स्वर से पुकारता हुआ समाधि से जगाने का प्रयत्न करने लगा। समाधि से जागकर ऋषि ने अपने अद्र्वोन्मीलित नेत्र शिशु पर स्थित कर दिए। उनकी वात्सल्यभरी मुद्रा से स्पष्ट


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