था कि शिशु उन्हें कितना प्रिय है। आनन्द-विभोर होकर शिशु ने कहा, ‘‘मैं नीचे जा रहा हूं। आप भी मेरे साथ चलें’’ ऋषि ने उत्तर नहीं दिया, पर उनकी वत्सल दृष्टि में स्वीकार का भाव था। शिशु की ओर देखते-देखते
31 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वह फिर समाधिस्थ हो गए। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनका एक अंश एक प्रकाश-पंुज के रूप में धरती की ओर उतर रहा है। जब मैंने नरेन्द्र को देखा तब देखते ही पहचान लिया कि ऋषि का रूप वही है। ’’(पृष्ठ 35)
था कि शिशु उन्हें कितना प्रिय है। आनन्द-विभोर होकर शिशु ने कहा, ‘‘मैं नीचे जा रहा हूं। आप भी मेरे साथ चलें’’ ऋषि ने उत्तर नहीं दिया, पर उनकी वत्सल दृष्टि में स्वीकार का भाव था। शिशु की ओर देखते-देखते
31 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वह फिर समाधिस्थ हो गए। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनका एक अंश एक प्रकाश-पंुज के रूप में धरती की ओर उतर रहा है। जब मैंने नरेन्द्र को देखा तब देखते ही पहचान लिया कि ऋषि का रूप वही है। ’’(पृष्ठ 35)