‘‘बोल, फिर शीघ्र ही आएगा तू!’’ लिखा है, ‘‘लाचार होकर पहले दिन की तरह वचन देकर ही लौटना पड़ा।’’
नरेन्द्र ने विस्मय की सीमा न थी। वह लौटते समय मन ही मन सोचने लगा कि आखिर यह पहेली क्या है? इस पहेली को तो समझना ही होगा। नरेन्द्र की इस समय की मनःस्थिति को स्वामी सारदानन्द ने अपने गं्रथ ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग में यों व्यक्त किया हैः
‘‘मैं सोचने लगा कि इच्छा मात्र से यह पुरूष यदि मेरे जैसे प्रबल इच्छशक्ति-सम्पन्न चित्त
‘‘बोल, फिर शीघ्र ही आएगा तू!’’ लिखा है, ‘‘लाचार होकर पहले दिन की तरह वचन देकर ही लौटना पड़ा।’’
नरेन्द्र ने विस्मय की सीमा न थी। वह लौटते समय मन ही मन सोचने लगा कि आखिर यह पहेली क्या है? इस पहेली को तो समझना ही होगा। नरेन्द्र की इस समय की मनःस्थिति को स्वामी सारदानन्द ने अपने गं्रथ ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग में यों व्यक्त किया हैः
‘‘मैं सोचने लगा कि इच्छा मात्र से यह पुरूष यदि मेरे जैसे प्रबल इच्छशक्ति-सम्पन्न चित्त