योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

को दृढ़ संस्कारयुक्त गठन को इस तरह तोड़-फोड़ कर मिट्टी के लौंदे की तरह अपने भाव में ढाल सकते हैं तो इन्हें पागल ही कैसे समझूं? किन्त प्रथम दर्शन के दिन मुझे एकान्त में ले जाकर इन्होंने जिस प्रकार सम्बोधित करते हुए बातें की थी, उससे इन्हें पागल के अतिरिक्त और क्या मान सकता हूं। बुद्वि का उन्मेष होने के अनन्तर खोज तथा तर्कयुक्ति की सहायता से प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्ति के संबंध में एक मतामत स्थिर किए बिना मैं कभी निश्चित नहीं


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को दृढ़ संस्कारयुक्त गठन को इस तरह तोड़-फोड़ कर मिट्टी के लौंदे की तरह अपने भाव में ढाल सकते हैं तो इन्हें पागल ही कैसे समझूं? किन्त प्रथम दर्शन के दिन मुझे एकान्त में ले जाकर इन्होंने जिस प्रकार सम्बोधित करते हुए बातें की थी, उससे इन्हें पागल के अतिरिक्त और क्या मान सकता हूं। बुद्वि का उन्मेष होने के अनन्तर खोज तथा तर्कयुक्ति की सहायता से प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्ति के संबंध में एक मतामत स्थिर किए बिना मैं कभी निश्चित नहीं


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