मुसलमान, ईसाई तथा वैष्णव आदि सम्प्रदायों का धर्म के नाम पर आपस में लड़ना व्यर्थ है। उन्होंने एक ही सत्ता के ईश्वर, अल्लाह तथा गाॅड- अलग-अलग नाम रख लिये हैं और अपने-अपने मार्ग से एक उसी की खोज कर रहे हैं।
अब अपने इस आदर्श को कार्य-रूप देने के लिए उन्हें संगठन की ज़रूरत महसूस हुई। इसके लिए उन्होंने 1884 में शिष्य बनानाा शुरू किए और 1886 में अपनी मृत्य के समय तक 25 शिष्य जुटा लिए थे। नरेन्द्र उन सबमें श्रेष्ठ था और परमहंस
मुसलमान, ईसाई तथा वैष्णव आदि सम्प्रदायों का धर्म के नाम पर आपस में लड़ना व्यर्थ है। उन्होंने एक ही सत्ता के ईश्वर, अल्लाह तथा गाॅड- अलग-अलग नाम रख लिये हैं और अपने-अपने मार्ग से एक उसी की खोज कर रहे हैं।
अब अपने इस आदर्श को कार्य-रूप देने के लिए उन्हें संगठन की ज़रूरत महसूस हुई। इसके लिए उन्होंने 1884 में शिष्य बनानाा शुरू किए और 1886 में अपनी मृत्य के समय तक 25 शिष्य जुटा लिए थे। नरेन्द्र उन सबमें श्रेष्ठ था और परमहंस