ने उसके निर्माण में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। नरेन्द्र से उनका प्यार जुनून की हद तक बढ़ गया था। प्रियनाथ सिन्हा अपने संस्मरण में लिखते हैंः
‘‘नरेन्द्र बहुत दिनों से श्री रामकृष्ण देव के पास नहीं गए थे। इसीलिए वे स्वयं एक दिन सवेरे रामलाल के साथ कलकत्ता में नरेन्द्र के तंग में आए। उस दिन सवेरे नरेन्द्र के कमरे में दो सहपाठी, हरिदास चट्टोपाध्याय और दशरथि सान्याल बैठे थे। ये लोग कभी पढ़ते थे, तो कभी वार्तालाप करते थे। इसी समय बहिद्र्वार पर ‘नरेन’,
ने उसके निर्माण में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। नरेन्द्र से उनका प्यार जुनून की हद तक बढ़ गया था। प्रियनाथ सिन्हा अपने संस्मरण में लिखते हैंः
‘‘नरेन्द्र बहुत दिनों से श्री रामकृष्ण देव के पास नहीं गए थे। इसीलिए वे स्वयं एक दिन सवेरे रामलाल के साथ कलकत्ता में नरेन्द्र के तंग में आए। उस दिन सवेरे नरेन्द्र के कमरे में दो सहपाठी, हरिदास चट्टोपाध्याय और दशरथि सान्याल बैठे थे। ये लोग कभी पढ़ते थे, तो कभी वार्तालाप करते थे। इसी समय बहिद्र्वार पर ‘नरेन’,