योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

‘नरेन’ शब्द सुनाई पड़ा। स्वर सुनते ही नरेन्द्र हड़बड़ाकर तेजी से नीचे पहुंचे। उनके मित्रों ने भी समझ लिया कि श्री रामकृष्ण देव आये हैं, इसलिए नरेन्द्र इतने अस्त-व्यस्त होकर उन्हें परस्पर साक्षात्कार हुआ। श्री रामकृष्ण नरेन्द्र को देखते ही अश्रुपूर्ण लोचनों से गद्गद स्वर में कहने लगे, ‘तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं, तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं?’ बार-बार इस तरह कहते-कहते कमरे में आकर बैठ गए, बाद में अंगोछे में बंधे संदेश को खोलकर नरेन्द्र को ‘खा’ ,


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‘नरेन’ शब्द सुनाई पड़ा। स्वर सुनते ही नरेन्द्र हड़बड़ाकर तेजी से नीचे पहुंचे। उनके मित्रों ने भी समझ लिया कि श्री रामकृष्ण देव आये हैं, इसलिए नरेन्द्र इतने अस्त-व्यस्त होकर उन्हें परस्पर साक्षात्कार हुआ। श्री रामकृष्ण नरेन्द्र को देखते ही अश्रुपूर्ण लोचनों से गद्गद स्वर में कहने लगे, ‘तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं, तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं?’ बार-बार इस तरह कहते-कहते कमरे में आकर बैठ गए, बाद में अंगोछे में बंधे संदेश को खोलकर नरेन्द्र को ‘खा’ ,


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