योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

स्वर बांधकर नरेन्द्र ने गाना प्रारम्भ कियाः-

जागो मां कुल कुंडलिनी

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‘‘ज्योंही गाना आरम्भ हुआ, श्री रामकृष्ण भी भावास्थ होने लगे। गाने के स्तर-स्तर में उनका मन ऊपर उठने लगा, आंखे भी अपलक हो गई, अंग स्पंदनहीन हो गए, मुख ने अलौकिक भाव धारण किया, और धीरे-धीरे संगमरमर की मूर्ति के समान निस्पंद हो वे निर्विकल्प समाधि में लीन हो गए। नरेन्द्र के मित्रों ने इससे पहले


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स्वर बांधकर नरेन्द्र ने गाना प्रारम्भ कियाः-

जागो मां कुल कुंडलिनी

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‘‘ज्योंही गाना आरम्भ हुआ, श्री रामकृष्ण भी भावास्थ होने लगे। गाने के स्तर-स्तर में उनका मन ऊपर उठने लगा, आंखे भी अपलक हो गई, अंग स्पंदनहीन हो गए, मुख ने अलौकिक भाव धारण किया, और धीरे-धीरे संगमरमर की मूर्ति के समान निस्पंद हो वे निर्विकल्प समाधि में लीन हो गए। नरेन्द्र के मित्रों ने इससे पहले


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