योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

किसी मनुष्य को इस प्रकार भावास्थ नहीं देखा था। वे श्री रामकृष्ण की यह अवस्था देखकर मन में सोचने लगे-मालूम होता है, शरीर में किसी प्रकार की वेदना सहसा उत्पन्न हो गई है, इसलिए वे संज्ञाशून्य हो गए हैं। वे बहुत डरे। दशरथि तो जल्दी-जल्दी पानी लाकर उनके मुख पर छींटा देने का प्रयत्न करने लगे। यह देखकर नरेन्द्र उनको रोककर कहने लगे, ‘उसकी कोई आवश्यकता नहीं। वे संज्ञाशून्य नहीं हुए हैं, वे भावास्थ हुए हैं। फिर से गाना सुनते-सुनते


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किसी मनुष्य को इस प्रकार भावास्थ नहीं देखा था। वे श्री रामकृष्ण की यह अवस्था देखकर मन में सोचने लगे-मालूम होता है, शरीर में किसी प्रकार की वेदना सहसा उत्पन्न हो गई है, इसलिए वे संज्ञाशून्य हो गए हैं। वे बहुत डरे। दशरथि तो जल्दी-जल्दी पानी लाकर उनके मुख पर छींटा देने का प्रयत्न करने लगे। यह देखकर नरेन्द्र उनको रोककर कहने लगे, ‘उसकी कोई आवश्यकता नहीं। वे संज्ञाशून्य नहीं हुए हैं, वे भावास्थ हुए हैं। फिर से गाना सुनते-सुनते


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