योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

पुस्तक आदि उसी तरह पड़ी रही। केवल तानपूरे को यत्नपूर्वक रखकर उन्होंने श्री गुरूदेव के साथ दक्षिणश्वर प्रस्थान किया।’’ ( विवेकानन्द साहित्य,अष्टम खंड, पृष्ठ 260-62)

नरेन्द्र अगर कुछ दिन तक दक्षिणेश्वर नहीं जाता था तो रामकृष्ण बहुत व्याकुल हो उठते थे। 1883 की बात है, वे एक दिन बरामदे में बेचैन घूर रहे थे और रोते हुए कह रहे थे , ‘‘मां, उसे देखे बिना मैं रह नहीं सकता।’’ कुछ क्षण बाद उन्होंने अपने को सम्भाला और कमरे में शिष्यों के पास आकर बैठ गए,


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पुस्तक आदि उसी तरह पड़ी रही। केवल तानपूरे को यत्नपूर्वक रखकर उन्होंने श्री गुरूदेव के साथ दक्षिणश्वर प्रस्थान किया।’’ ( विवेकानन्द साहित्य,अष्टम खंड, पृष्ठ 260-62)

नरेन्द्र अगर कुछ दिन तक दक्षिणेश्वर नहीं जाता था तो रामकृष्ण बहुत व्याकुल हो उठते थे। 1883 की बात है, वे एक दिन बरामदे में बेचैन घूर रहे थे और रोते हुए कह रहे थे , ‘‘मां, उसे देखे बिना मैं रह नहीं सकता।’’ कुछ क्षण बाद उन्होंने अपने को सम्भाला और कमरे में शिष्यों के पास आकर बैठ गए,


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