योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

‘‘इतना रोया, पर नरेन्द्र नहीं आया’’ वे बेसुध से कह रहे थे, ‘‘उसे एक बार देखने के लिए मेरे हृदय में बड़ी पीड़ा होती है, छाती के भीतर मानो कोई मरोड़ रहा है, पर मेरे खिंचाव को वह नहीं समझता।’’ जब नरेन्द्र आ जाता तो पहले उससे गाने सुनते और फिर खूब खिलाते-पिलाते थे। कई बार उसे ढूढ़ने खुद भी शहर जाते थे।

रामकृष्ण नरेन्द्र को अपने शिष्यों में सबसे अधिक प्यार करते थे। उन्होंने सुरेन्द्रनाथ के मकान पर पहली ही नज़र में पहचान लिया था कि नरेन्द्र एक सत्यनिष्ठ


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‘‘इतना रोया, पर नरेन्द्र नहीं आया’’ वे बेसुध से कह रहे थे, ‘‘उसे एक बार देखने के लिए मेरे हृदय में बड़ी पीड़ा होती है, छाती के भीतर मानो कोई मरोड़ रहा है, पर मेरे खिंचाव को वह नहीं समझता।’’ जब नरेन्द्र आ जाता तो पहले उससे गाने सुनते और फिर खूब खिलाते-पिलाते थे। कई बार उसे ढूढ़ने खुद भी शहर जाते थे।

रामकृष्ण नरेन्द्र को अपने शिष्यों में सबसे अधिक प्यार करते थे। उन्होंने सुरेन्द्रनाथ के मकान पर पहली ही नज़र में पहचान लिया था कि नरेन्द्र एक सत्यनिष्ठ


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