योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

उसे उन्होंने यों व्यक्त किया हैः ‘‘मेरे नरेन्द्र के भीतर थोड़ी भी कृत्रिमता नहीं है। बजाकर देखो तो ठन-ठन शब्द होता है। दूसरे लड़कों को देखता हूं, मानो आंख-कान दबाकर किसी तरह दो-तीन परीक्षाओं को पार कर लिया है, बस वहीं तक-उतना करते ही सारी शक्ति निकल गई है। परन्तु नरेन्द्र वैसा नहीं है, हंसते-हंसते सब काम करता है, पास करना उसके लिए कोई बात ही नहीं। वह ब्रह्मसमाज में भी जाता है, वहां भजन गाता है। परन्तु दूसरे ब्रह्मों की


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उसे उन्होंने यों व्यक्त किया हैः ‘‘मेरे नरेन्द्र के भीतर थोड़ी भी कृत्रिमता नहीं है। बजाकर देखो तो ठन-ठन शब्द होता है। दूसरे लड़कों को देखता हूं, मानो आंख-कान दबाकर किसी तरह दो-तीन परीक्षाओं को पार कर लिया है, बस वहीं तक-उतना करते ही सारी शक्ति निकल गई है। परन्तु नरेन्द्र वैसा नहीं है, हंसते-हंसते सब काम करता है, पास करना उसके लिए कोई बात ही नहीं। वह ब्रह्मसमाज में भी जाता है, वहां भजन गाता है। परन्तु दूसरे ब्रह्मों की


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