योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

हठी, दम्भी तथा कैसे तड़प् रहा है और जीवन रहस्य पा जाने के लिए सुख-भोग तो क्या, वह प्राण तक होम कर सकता है।

रामकृष्ण किसी भी व्यक्ति को जांच-परखकर अपना शिष्य बनाया करते थे। नरेन्द्र की असाधारण प्रतिभा को चाहे उन्होंने पहचान लिया था और चाहे वे उसे तन-मन से प्यार करते थे, उसे देखे बिना चैन न पड़ता था, लेकिन शिष्य के रूप में ग्रहण करनके से पहले उसकी भी परीक्षा लेना आवश्यक था। हो सकता है कि दृष्टि ने धोखा खाया हो। इसी तरह जो व्यक्ति शिक्षा देने का योग्य अधिकारी न हो,


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हठी, दम्भी तथा कैसे तड़प् रहा है और जीवन रहस्य पा जाने के लिए सुख-भोग तो क्या, वह प्राण तक होम कर सकता है।

रामकृष्ण किसी भी व्यक्ति को जांच-परखकर अपना शिष्य बनाया करते थे। नरेन्द्र की असाधारण प्रतिभा को चाहे उन्होंने पहचान लिया था और चाहे वे उसे तन-मन से प्यार करते थे, उसे देखे बिना चैन न पड़ता था, लेकिन शिष्य के रूप में ग्रहण करनके से पहले उसकी भी परीक्षा लेना आवश्यक था। हो सकता है कि दृष्टि ने धोखा खाया हो। इसी तरह जो व्यक्ति शिक्षा देने का योग्य अधिकारी न हो,


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