उसे नरेन्द्र उसे गुरू धारण करने को तैयार नहीं था, इसलिए उसने भी रामकृष्ण के स्वभाव और शक्ति की परीक्षा लेना आवश्यक समझाा। यों कहिए कि एक अद्भुत पुरूष और एक असाधारण युवक अपने-अपने कक्षपथ में घूमने वाले नक्षत्रों की तरह सहसा एक दूसरे से आ टकराए और उन दोनों में गुरू-शिष्य का संबंध होने से पहले वे एक-दूसरे की परीक्षा लेते-एक दूसरे को समझते-परखते रहे।
नरेन्द्र दक्षिणेश्वर आने से पहले ब्रह्मसमाज का सदस्य था और उसके प्रतिज्ञा-पत्र,
उसे नरेन्द्र उसे गुरू धारण करने को तैयार नहीं था, इसलिए उसने भी रामकृष्ण के स्वभाव और शक्ति की परीक्षा लेना आवश्यक समझाा। यों कहिए कि एक अद्भुत पुरूष और एक असाधारण युवक अपने-अपने कक्षपथ में घूमने वाले नक्षत्रों की तरह सहसा एक दूसरे से आ टकराए और उन दोनों में गुरू-शिष्य का संबंध होने से पहले वे एक-दूसरे की परीक्षा लेते-एक दूसरे को समझते-परखते रहे।
नरेन्द्र दक्षिणेश्वर आने से पहले ब्रह्मसमाज का सदस्य था और उसके प्रतिज्ञा-पत्र,