‘निराकार अद्वितीय ईश्वर रखकर केवल उसी की उपासना करूंगा’ पर हस्ताक्षर भी किए थे। अब रामकृष्ण ने उसे अष्टावक्र संहिता आदि ग्रंथ पढ़ने को
36 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
दिए। लेकिन इनमें व्यक्त मान्यताएं नरेन्द्र के पूर्व संस्कारों तथा मान्याताओं के विपरीत थी, इसलिए वह झुंझला उठता,:ःमैं ये पूस्तकें नहीं पढूंगा। मनुष्य को ईश्वर कहना, इससे बड़ा पाप और क्या होगा? गं्रथकर्ता ऋषि-मुनियों का मस्तिष्क अवश्य ही विकृत हो गया था,
‘निराकार अद्वितीय ईश्वर रखकर केवल उसी की उपासना करूंगा’ पर हस्ताक्षर भी किए थे। अब रामकृष्ण ने उसे अष्टावक्र संहिता आदि ग्रंथ पढ़ने को
36 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
दिए। लेकिन इनमें व्यक्त मान्यताएं नरेन्द्र के पूर्व संस्कारों तथा मान्याताओं के विपरीत थी, इसलिए वह झुंझला उठता,:ःमैं ये पूस्तकें नहीं पढूंगा। मनुष्य को ईश्वर कहना, इससे बड़ा पाप और क्या होगा? गं्रथकर्ता ऋषि-मुनियों का मस्तिष्क अवश्य ही विकृत हो गया था,