नरेन्द्र की इस प्रकार की आलोचना से रामकृष्ण के भक्त और शिष्य उससे चिढ़ गए थे। शुरू-शुरू में वे उसे कठी तथा अंहकारी समझने लगे थे। पर नरेन्द्र का ज्ञान देखकर स्वयं रामकृष्ण का आनन्द इतना तीव्र हो उठता था कि वे बीच-बीच में भावानिष्ट हो जाते थे। रोमां रोलां लिखते हैं:
‘‘नरेन्द्र की तीव्र आलोचना और उसके आवेगमय तर्क उन्हें आनन्द से मग्न कर देते थे। नरेन्द्र की उज्जवलतम तर्क बुद्वि और सत्य के अनुसंधान के लिए उसकी अथक निष्ठा के प्रति उनकी गहरी श्रद्वा थी,
नरेन्द्र की इस प्रकार की आलोचना से रामकृष्ण के भक्त और शिष्य उससे चिढ़ गए थे। शुरू-शुरू में वे उसे कठी तथा अंहकारी समझने लगे थे। पर नरेन्द्र का ज्ञान देखकर स्वयं रामकृष्ण का आनन्द इतना तीव्र हो उठता था कि वे बीच-बीच में भावानिष्ट हो जाते थे। रोमां रोलां लिखते हैं:
‘‘नरेन्द्र की तीव्र आलोचना और उसके आवेगमय तर्क उन्हें आनन्द से मग्न कर देते थे। नरेन्द्र की उज्जवलतम तर्क बुद्वि और सत्य के अनुसंधान के लिए उसकी अथक निष्ठा के प्रति उनकी गहरी श्रद्वा थी,