वे उसे शैव-शक्ति का प्रकाश मानते
38 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
थे और कहते थे कि यह शक्ति ही अंत में माया को पराभूत करेगी। वे कहते थे-देखो! कैसी अंतर्भेदी दृष्टि है। यह एक प्रज्वलित अग्निशिखा है, जो समस्त अपवित्रता को भस्म कर देगी। महामाया, स्वयं भी उसके पास दस कदम के अंदर तक नहीं घुस सकती। उसने उसे जो महिमा दी है उसकी शक्ति ही उसे पीछे रोक रखती है।’’ (रामकृष्ण, पृष्ठ 255)
यह भी लिखा हैः
‘‘तथापि कभी-कभी जब उसकी
वे उसे शैव-शक्ति का प्रकाश मानते
38 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
थे और कहते थे कि यह शक्ति ही अंत में माया को पराभूत करेगी। वे कहते थे-देखो! कैसी अंतर्भेदी दृष्टि है। यह एक प्रज्वलित अग्निशिखा है, जो समस्त अपवित्रता को भस्म कर देगी। महामाया, स्वयं भी उसके पास दस कदम के अंदर तक नहीं घुस सकती। उसने उसे जो महिमा दी है उसकी शक्ति ही उसे पीछे रोक रखती है।’’ (रामकृष्ण, पृष्ठ 255)
यह भी लिखा हैः
‘‘तथापि कभी-कभी जब उसकी