योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

तो फिर किसलिए यहां आता है?’’ नरेन्द्र ने चट उत्तर दिया, ‘‘आपको चाहता हूं, इसीलिए देखने को आता हूं, बात सुनने के लिए नहीं।’’ उसका यह उत्तर सुनकर रामकृष्ण भावानन्द से गद्गद हो उठे।

अपने पर रामकृष्ण का इतना स्नेह देखकर एक दिन नरेन्द्र ने उनसे मज़ाक में कहा, ‘‘पुराण में लिखा है, राजा भरत दिन-रात अपने पालित हिरण की बात सोचते-सोचते मरने के बाद हिरण हुए थे। आप मेरे लिए जितना करते हैं, उससे आप की भी वही दशा होगी।’’ शिशु के समान सरल रामकृष्ण चिंतित होकर बोले,


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तो फिर किसलिए यहां आता है?’’ नरेन्द्र ने चट उत्तर दिया, ‘‘आपको चाहता हूं, इसीलिए देखने को आता हूं, बात सुनने के लिए नहीं।’’ उसका यह उत्तर सुनकर रामकृष्ण भावानन्द से गद्गद हो उठे।

अपने पर रामकृष्ण का इतना स्नेह देखकर एक दिन नरेन्द्र ने उनसे मज़ाक में कहा, ‘‘पुराण में लिखा है, राजा भरत दिन-रात अपने पालित हिरण की बात सोचते-सोचते मरने के बाद हिरण हुए थे। आप मेरे लिए जितना करते हैं, उससे आप की भी वही दशा होगी।’’ शिशु के समान सरल रामकृष्ण चिंतित होकर बोले,


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