‘‘तू ठीक कहता है, ठीक ही तो कहता है, तो फिर क्या होगा? मैं तो तुझे देखे बिना रह नहीं सकता।’’ संदेह का उदय होते ही रामकृष्ण चट काली मंदिर में मां के पास गए और कुछ क्षण बाद हंसते हुए लौट आए। बोले, ‘‘अरे मूर्ख, मैं तेरी बात नहीं मानूंगा। मां ने कहा, तू उसे (नरेन्द्र को) साक्षात् नारायण मानता है, इसीलिए प्यार करता है। जिस दिन उसके भीतर नारायण नहीं देखेगा, उस दिन उसका मुंह देखने की भी तुझे इच्छा न होगी।’’
1881 से 1884 तक,
‘‘तू ठीक कहता है, ठीक ही तो कहता है, तो फिर क्या होगा? मैं तो तुझे देखे बिना रह नहीं सकता।’’ संदेह का उदय होते ही रामकृष्ण चट काली मंदिर में मां के पास गए और कुछ क्षण बाद हंसते हुए लौट आए। बोले, ‘‘अरे मूर्ख, मैं तेरी बात नहीं मानूंगा। मां ने कहा, तू उसे (नरेन्द्र को) साक्षात् नारायण मानता है, इसीलिए प्यार करता है। जिस दिन उसके भीतर नारायण नहीं देखेगा, उस दिन उसका मुंह देखने की भी तुझे इच्छा न होगी।’’
1881 से 1884 तक,