तीन वर्ष इसी तरह चलता रहा। जब नरेन्द्र ने दक्षिणेश्वर आना-जाना शुरू किया तो उसे एफ.ए. की परीक्षा देने थी। तब तक वह मिल आदि पाश्चात्य नैयायिकों के मतवाद का अध्ययन बराबर जारी रखा। बी.ए. पास करते-करते उसने देकार्त का अहंवाद, ह्मूम और बेनथैन की नास्तिकता, अज्ञेयवाद और आदर्श चिद्वस्तुवाद, डारविन का विकासवाद, काम्टे और स्पेन्सर का अज्ञेयवाद और आदर्श समाज की अभिव्यक्ति के संबंध में बहुत कुछ पढ़ लिया था। उन दिनों जर्मन दार्शनिकों की बड़ी चर्चा थी,
तीन वर्ष इसी तरह चलता रहा। जब नरेन्द्र ने दक्षिणेश्वर आना-जाना शुरू किया तो उसे एफ.ए. की परीक्षा देने थी। तब तक वह मिल आदि पाश्चात्य नैयायिकों के मतवाद का अध्ययन बराबर जारी रखा। बी.ए. पास करते-करते उसने देकार्त का अहंवाद, ह्मूम और बेनथैन की नास्तिकता, अज्ञेयवाद और आदर्श चिद्वस्तुवाद, डारविन का विकासवाद, काम्टे और स्पेन्सर का अज्ञेयवाद और आदर्श समाज की अभिव्यक्ति के संबंध में बहुत कुछ पढ़ लिया था। उन दिनों जर्मन दार्शनिकों की बड़ी चर्चा थी,