योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

ईसा मसीह की वाणी ही उनके आध्यात्मिक भाव की चरम सीमा थी। नरेन्द्र को धर्म में प्रवृत्त देखकर उन्होंने एक दिन उसे बाइबिल उपहार में दिया और कहा, ‘‘ले, धर्म-कर्म सब इसी में है।’’ दरअसल हाफिज़ की कविता तथा बाइबिल भी वे मन बहलावे अथवा फैशन के तौर पर पढ़ते थे। उनकी स्वार्थ प्रिय बुद्वि को इन दो ग्रंथों की भी और कोई व्यावहारिक उपयोगिता दिखाई नहीं देती थी। वे नितान्त आत्मसेवी थे, धन और यश उनकी जीवन-नौका के दो चप्पू थे। पहले आप सुख भोग से रहो,


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ईसा मसीह की वाणी ही उनके आध्यात्मिक भाव की चरम सीमा थी। नरेन्द्र को धर्म में प्रवृत्त देखकर उन्होंने एक दिन उसे बाइबिल उपहार में दिया और कहा, ‘‘ले, धर्म-कर्म सब इसी में है।’’ दरअसल हाफिज़ की कविता तथा बाइबिल भी वे मन बहलावे अथवा फैशन के तौर पर पढ़ते थे। उनकी स्वार्थ प्रिय बुद्वि को इन दो ग्रंथों की भी और कोई व्यावहारिक उपयोगिता दिखाई नहीं देती थी। वे नितान्त आत्मसेवी थे, धन और यश उनकी जीवन-नौका के दो चप्पू थे। पहले आप सुख भोग से रहो,


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