योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

फिर जो धन बचे उसे दान में देकर दूसरों की दृष्टि में सुखी और श्रेष्ठ बनो। कलकत्ता के शिक्षित समाज में ऐसे ही लोगों की संख्या दिन-दिन बढ़ रही थी। इन लोगों की यह धारणा बन गई थी कि विज्ञान, स्वतंत्र, चिंतन और आध्यात्मिक भी अगर है तो पश्चिम के पास है, हमारे ऋषियों तथा शास्त्रों से अंधविश्वास और दुर्बलता के सिवा और कुछ नहीं सीखा जा सकता। इसी पाश्चात्य शिक्षा के कारण ब्रह्मसमाज दो मे विभाजित हो गई थी। भावावेश में आनन्द-विभोर


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फिर जो धन बचे उसे दान में देकर दूसरों की दृष्टि में सुखी और श्रेष्ठ बनो। कलकत्ता के शिक्षित समाज में ऐसे ही लोगों की संख्या दिन-दिन बढ़ रही थी। इन लोगों की यह धारणा बन गई थी कि विज्ञान, स्वतंत्र, चिंतन और आध्यात्मिक भी अगर है तो पश्चिम के पास है, हमारे ऋषियों तथा शास्त्रों से अंधविश्वास और दुर्बलता के सिवा और कुछ नहीं सीखा जा सकता। इसी पाश्चात्य शिक्षा के कारण ब्रह्मसमाज दो मे विभाजित हो गई थी। भावावेश में आनन्द-विभोर


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