41 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
ने अपने दर्शन-गं्रथ के उपसंहार में लिखा है, ‘‘संसार का नियामक इेश्वर है-इस सत्य सिद्वांत का आभास पाकर मनुष्य की बुद्वि निरस्त हो जाती है। ईश्वर का स्वरूप क्या है, यह प्रकट करने की शक्ति उसमें नहीं है। अतः दर्शन शास्त्र की वहीं इतिश्री है-और जहां दर्शन की समाप्ति है, वहीं अध्यात्मिकता का प्रारम्भ है।’’ दक्षिणेश्वर में वह रामकृष्ण के शिष्यों से इसकी चर्चा खूब करता था। देखा जाए तो वह जाने-अनजाने
41 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
ने अपने दर्शन-गं्रथ के उपसंहार में लिखा है, ‘‘संसार का नियामक इेश्वर है-इस सत्य सिद्वांत का आभास पाकर मनुष्य की बुद्वि निरस्त हो जाती है। ईश्वर का स्वरूप क्या है, यह प्रकट करने की शक्ति उसमें नहीं है। अतः दर्शन शास्त्र की वहीं इतिश्री है-और जहां दर्शन की समाप्ति है, वहीं अध्यात्मिकता का प्रारम्भ है।’’ दक्षिणेश्वर में वह रामकृष्ण के शिष्यों से इसकी चर्चा खूब करता था। देखा जाए तो वह जाने-अनजाने