योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

उसके स्वतंत्र स्वभाव को जानते हुए विश्वनाथ ने इस संबंध में सीधे बात करना उचित नहीं समझा और नरेन्द्र को ढर्रे पर लाने का काम उसके एक प्रिय सहपाठी मित्र को सौंपा।

एक दिन नरेन्द्र ‘तंग’ में बैठा परीक्षा की तैयारी के लिए पाठ्य पुुस्तक पढ़ रहा था, उसका यह सहपाठी मित्र आया और गम्भीर मुद्रा धारण करके कहने लगा, ‘‘नरेन्द्र, साध संग, धर्म, अर्चना आदि पागलपन छोड़! ऐसा काम कर जिससे सांसारिक सुख-सुविधा प्राप्त हो।’’ तथाकथित अनुभवी


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उसके स्वतंत्र स्वभाव को जानते हुए विश्वनाथ ने इस संबंध में सीधे बात करना उचित नहीं समझा और नरेन्द्र को ढर्रे पर लाने का काम उसके एक प्रिय सहपाठी मित्र को सौंपा।

एक दिन नरेन्द्र ‘तंग’ में बैठा परीक्षा की तैयारी के लिए पाठ्य पुुस्तक पढ़ रहा था, उसका यह सहपाठी मित्र आया और गम्भीर मुद्रा धारण करके कहने लगा, ‘‘नरेन्द्र, साध संग, धर्म, अर्चना आदि पागलपन छोड़! ऐसा काम कर जिससे सांसारिक सुख-सुविधा प्राप्त हो।’’ तथाकथित अनुभवी


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