योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

व्यक्तियों से ऐसी बातें सुनते-सुनते नरेन्द्र के कान पक चुके थे, अब एक प्रिय मित्र के मुंह से भी वहीं उपदेश सुनकर वह स्तब्ध रह गया। कुछ क्षण मौन और स्थिर बैठा रहा, फिर बोला, ‘‘सुन मेरा विचार तुझसे एकदम भिन्न है। मैं संन्यास को मानव जीवन का सर्वोच्च आदर्श मानता हूं। परिवर्तनशील अनत्यि संसार के सुख की कामना में इधर उधर दौड़ने की अपेक्षा उस अपरिवर्तनशील ‘सत्यं, शिवं, सुन्दरम्’ के लिए प्राणपण से प्रयास करना कहीं श्रेष्ठ है।’’


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व्यक्तियों से ऐसी बातें सुनते-सुनते नरेन्द्र के कान पक चुके थे, अब एक प्रिय मित्र के मुंह से भी वहीं उपदेश सुनकर वह स्तब्ध रह गया। कुछ क्षण मौन और स्थिर बैठा रहा, फिर बोला, ‘‘सुन मेरा विचार तुझसे एकदम भिन्न है। मैं संन्यास को मानव जीवन का सर्वोच्च आदर्श मानता हूं। परिवर्तनशील अनत्यि संसार के सुख की कामना में इधर उधर दौड़ने की अपेक्षा उस अपरिवर्तनशील ‘सत्यं, शिवं, सुन्दरम्’ के लिए प्राणपण से प्रयास करना कहीं श्रेष्ठ है।’’


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