योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



परममित्र तो उसे समझाने का कर्तव्य अपने ऊपर ओढ़कर आया था, वह उत्ोजित होकर बोला, ‘‘देखो नरेन्द्र, तुम्हारी जितनी बुद्वि और प्रतिभा है, उससे तुम जीवन में कितनी उन्नति कर सकते हो। दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण ने तुम्हारी बुद्वि बिगाड़ दी है। कुशल चाहते हो तो उस पागल का संग छोड़ दो, नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा।’’

नरेन्द्र पुस्तक छोड़कर कमरे में टलहने लगा। मित्र अपनी बात कहता रहा और उसने रामकृष्ण के बारे में कई प्रश्न पूछे। नरेन्द्र रूका और शांत भाव से बोला,


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परममित्र तो उसे समझाने का कर्तव्य अपने ऊपर ओढ़कर आया था, वह उत्ोजित होकर बोला, ‘‘देखो नरेन्द्र, तुम्हारी जितनी बुद्वि और प्रतिभा है, उससे तुम जीवन में कितनी उन्नति कर सकते हो। दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण ने तुम्हारी बुद्वि बिगाड़ दी है। कुशल चाहते हो तो उस पागल का संग छोड़ दो, नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा।’’

नरेन्द्र पुस्तक छोड़कर कमरे में टलहने लगा। मित्र अपनी बात कहता रहा और उसने रामकृष्ण के बारे में कई प्रश्न पूछे। नरेन्द्र रूका और शांत भाव से बोला,


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