योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

मैंने ईश्वर के दर्शन किए हैं। तुम्हें जिस प्रकार प्रत्यक्ष देख रहा हूं, इससे भी कहीं अधिक स्पष्ट रूप से उन्हें देखा है।’ नरेन्द्र का विस्मय सौ गुना बढ़ाते हुए उन्होंने फिर कहा, ‘क्या तुम भी देखना चाहते हो? यदि तुम मेरे कहे अनुसार काम करो, तो तुम्हें भी दिखा सकता हूं। ’’ (पृष्ठ 93-94)

इस वाणी में विश्वास का बल था। नरेन्द्र ने रामकृष्ण परमहंस को मन से गुरू धारण किया, अपनी साभिमान स्वतंत्रता उन्हें सौंप दी और उनके बताए अनुसार साधना आरम्भ की।


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मैंने ईश्वर के दर्शन किए हैं। तुम्हें जिस प्रकार प्रत्यक्ष देख रहा हूं, इससे भी कहीं अधिक स्पष्ट रूप से उन्हें देखा है।’ नरेन्द्र का विस्मय सौ गुना बढ़ाते हुए उन्होंने फिर कहा, ‘क्या तुम भी देखना चाहते हो? यदि तुम मेरे कहे अनुसार काम करो, तो तुम्हें भी दिखा सकता हूं। ’’ (पृष्ठ 93-94)

इस वाणी में विश्वास का बल था। नरेन्द्र ने रामकृष्ण परमहंस को मन से गुरू धारण किया, अपनी साभिमान स्वतंत्रता उन्हें सौंप दी और उनके बताए अनुसार साधना आरम्भ की।


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