योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

लगा-क्या भगवान सचमुच है? अगर है तो मैं जो इतनी प्रार्थनाएं करता हूं, वह सुनता क्यों नहीं? शिव के संसार में इतना अशिव क्यों है? उसे ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के शब्द स्मरण हो आए-‘यदि भगवान दयामय और मंगलमय है तो अकाल में लाखों आदमी बिना अन्न क्यों मर जाते है?’

उसके मन में ईश्वर के विरूद्व प्रचंड विद्रोह की भावना उत्पन्न हुई और वह सोचने लगा-ईश्वर यदि है भी तो उसे पुकारना व्यर्थ है, क्योंकि इससे कुछ लाभ नहीं होता।

अब नरेन्द्र


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लगा-क्या भगवान सचमुच है? अगर है तो मैं जो इतनी प्रार्थनाएं करता हूं, वह सुनता क्यों नहीं? शिव के संसार में इतना अशिव क्यों है? उसे ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के शब्द स्मरण हो आए-‘यदि भगवान दयामय और मंगलमय है तो अकाल में लाखों आदमी बिना अन्न क्यों मर जाते है?’

उसके मन में ईश्वर के विरूद्व प्रचंड विद्रोह की भावना उत्पन्न हुई और वह सोचने लगा-ईश्वर यदि है भी तो उसे पुकारना व्यर्थ है, क्योंकि इससे कुछ लाभ नहीं होता।

अब नरेन्द्र


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