‘‘महराज, नरेन्द्र की ऐसी गति होगी, यह तो स्वप्न में भी संभव नहीं था।’ तो उस समय ठाकुर ने उत्ोजित होकर कहा था, ‘चुप रह मूर्ख! मां ने कहा है कि वह कभी वैसा नहीं हो सकता! यदि फिर कभी ऐसी बात मुझसे कही तो तेरा मुंह नहीं देख सकूंगा।’’ (रामकृष्ण लीला प्रसंग, तृतीय खंड, पृष्ठ 177)
नरेन्द्र को दूसरों की निंदा-प्रशंसा की कोई परवाह नहीं थी। गर्मी के बाद बरसात आई और चली गई, पर सब तरफ भटकते रहने के बावजुद रहने के बावजुद उसे कोई
‘‘महराज, नरेन्द्र की ऐसी गति होगी, यह तो स्वप्न में भी संभव नहीं था।’ तो उस समय ठाकुर ने उत्ोजित होकर कहा था, ‘चुप रह मूर्ख! मां ने कहा है कि वह कभी वैसा नहीं हो सकता! यदि फिर कभी ऐसी बात मुझसे कही तो तेरा मुंह नहीं देख सकूंगा।’’ (रामकृष्ण लीला प्रसंग, तृतीय खंड, पृष्ठ 177)
नरेन्द्र को दूसरों की निंदा-प्रशंसा की कोई परवाह नहीं थी। गर्मी के बाद बरसात आई और चली गई, पर सब तरफ भटकते रहने के बावजुद रहने के बावजुद उसे कोई