कथा कहिते डराई,
ना कहिते ओ डराई,
(आमार) मने सन्देह हय
बुझि तोमाय हाराई, हा-राई।
(बात कहने में डरता हूं, न कहने में भी डरता हूं, मेरे मन में संदेह होता है कि शायद तुम्हें खो बैठूं।)
‘‘अन्तर की प्रबल भाव राशि को अब तक मैंने रोक रखा था। अब उसका
46 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वेग नहीं सम्भाल सका। ठाकुर की तरह मेरे भी नेत्रों से आंसुओं की धाराएं बह चली। हमारे इस प्रकार के आचरण से दूसरे लोग अवाक् रह गए। प्रकृतिस्थ होने पर उन्होंने हंसते हुए कहा,
कथा कहिते डराई,
ना कहिते ओ डराई,
(आमार) मने सन्देह हय
बुझि तोमाय हाराई, हा-राई।
(बात कहने में डरता हूं, न कहने में भी डरता हूं, मेरे मन में संदेह होता है कि शायद तुम्हें खो बैठूं।)
‘‘अन्तर की प्रबल भाव राशि को अब तक मैंने रोक रखा था। अब उसका
46 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वेग नहीं सम्भाल सका। ठाकुर की तरह मेरे भी नेत्रों से आंसुओं की धाराएं बह चली। हमारे इस प्रकार के आचरण से दूसरे लोग अवाक् रह गए। प्रकृतिस्थ होने पर उन्होंने हंसते हुए कहा,