योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

वहीं मा तुझे देगी। मेरी मां चिन्मयी ब्रह्मशक्ति है, उन्होंने अपनी इच्छा से संसार का प्रसव किया है। वे चाहें तो क्या नहीं कर सकती?’’

परमहंस के आग्रह से नरेन्द्र एक बार नहीं, दो बार, तीन बार मंदिर में गया, पर वह एक बार भी स्वार्थपूर्ति के प्रार्थना नहीं कर पाया। लिखा है, ‘‘मंदिर में प्रवेश करते ही लज्जा ने हृदय को व्याप्त कर लिया, मैंने सोचा, यह कैसी तुच्छ बात है- मैं जगद्जननी को कहने आया। ठाकुर कहते हैं, ‘राजा की प्रसन्नता


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वहीं मा तुझे देगी। मेरी मां चिन्मयी ब्रह्मशक्ति है, उन्होंने अपनी इच्छा से संसार का प्रसव किया है। वे चाहें तो क्या नहीं कर सकती?’’

परमहंस के आग्रह से नरेन्द्र एक बार नहीं, दो बार, तीन बार मंदिर में गया, पर वह एक बार भी स्वार्थपूर्ति के प्रार्थना नहीं कर पाया। लिखा है, ‘‘मंदिर में प्रवेश करते ही लज्जा ने हृदय को व्याप्त कर लिया, मैंने सोचा, यह कैसी तुच्छ बात है- मैं जगद्जननी को कहने आया। ठाकुर कहते हैं, ‘राजा की प्रसन्नता


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