योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

‘हां, महाराज! ब्हुत अच्छा हुआ।’ कुछ देर बाद पुनः हंसते हुए बोले, ‘नरेन्द्र ने मां को मान लिया, बहुत अच्छा

47 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

हुआ-क्यों?’ उसी बात को बारम्बार घुमा-फिराकर कहते हुए वे आनन्द प्रकट करने लगे।

‘‘निद्रा भंग होने पर लगभग दिन के चार बजे नरेन्द्र कमरे में आकर ठाकुर के पास बैठ गए। ठाकुर उन्हें देखते ही भावाष्टि होकर उनसे सटकर प्रायः उन्हीं की गोद में बैठे और कहने लगे, ‘अपना शरीर और नरेन्द्र का शरीर क्रमशः दिखाकर-देखता हूं कि यह मैं हूं,


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‘हां, महाराज! ब्हुत अच्छा हुआ।’ कुछ देर बाद पुनः हंसते हुए बोले, ‘नरेन्द्र ने मां को मान लिया, बहुत अच्छा

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हुआ-क्यों?’ उसी बात को बारम्बार घुमा-फिराकर कहते हुए वे आनन्द प्रकट करने लगे।

‘‘निद्रा भंग होने पर लगभग दिन के चार बजे नरेन्द्र कमरे में आकर ठाकुर के पास बैठ गए। ठाकुर उन्हें देखते ही भावाष्टि होकर उनसे सटकर प्रायः उन्हीं की गोद में बैठे और कहने लगे, ‘अपना शरीर और नरेन्द्र का शरीर क्रमशः दिखाकर-देखता हूं कि यह मैं हूं,


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