योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

फिर भी मैं हूं, सच कहता हूं-कुछ भी भेद नहीं देख पा रहा हूं। जैसे गंगा के जल में एक लाठी का आधा भाग डुबा देने से दो भाग दिखाई पड़ते हैं-पर यथार्थ में दो भाग नहीं हैं, एक ही है। समझा, मां के सिवाय और है ही क्या-क्यों?’

‘‘बातचीत में आठ बज गए। उस समय ठाकुर की भावास्था कम होते देखकर नरेन्द्र और मैं उनसे विदा लेकर कलकत्ता लौट आए। इसके बाद हमने नरेन्द्र को अनेक बार कहते सुना है-‘अकेले ठाकुर ही प्रथम दिन की भंेट से हर समय समान भाव से मेरे ऊपर विश्वास करते आए हैं,


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फिर भी मैं हूं, सच कहता हूं-कुछ भी भेद नहीं देख पा रहा हूं। जैसे गंगा के जल में एक लाठी का आधा भाग डुबा देने से दो भाग दिखाई पड़ते हैं-पर यथार्थ में दो भाग नहीं हैं, एक ही है। समझा, मां के सिवाय और है ही क्या-क्यों?’

‘‘बातचीत में आठ बज गए। उस समय ठाकुर की भावास्था कम होते देखकर नरेन्द्र और मैं उनसे विदा लेकर कलकत्ता लौट आए। इसके बाद हमने नरेन्द्र को अनेक बार कहते सुना है-‘अकेले ठाकुर ही प्रथम दिन की भंेट से हर समय समान भाव से मेरे ऊपर विश्वास करते आए हैं,


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