गई तो मैंने महसूस किया कि क्रांतिकारी तत्वों में भी विरासत में मिली गलत प्रवृत्िायां मौजुद हैं तो ऐतिहासिक परम्परा से जुड़ने के बाद संघर्ष की लम्बी प्रक्रिया ही में दूर होंगी।
विवेकानन्द बीसवीं सदी के अंत तक हमारे चिंतन को विकसित करके जहां पहुंचा गए है। उससे सूत्र जोड़कर ही द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और हमारी संस्कृति तथा परम्परा का विकास संभव है; यही सोचकर मैंने विवेकानन्द पर पुस्तक लिखना तय किया। वामपंथी छिछले छोकरों और
गई तो मैंने महसूस किया कि क्रांतिकारी तत्वों में भी विरासत में मिली गलत प्रवृत्िायां मौजुद हैं तो ऐतिहासिक परम्परा से जुड़ने के बाद संघर्ष की लम्बी प्रक्रिया ही में दूर होंगी।
विवेकानन्द बीसवीं सदी के अंत तक हमारे चिंतन को विकसित करके जहां पहुंचा गए है। उससे सूत्र जोड़कर ही द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और हमारी संस्कृति तथा परम्परा का विकास संभव है; यही सोचकर मैंने विवेकानन्द पर पुस्तक लिखना तय किया। वामपंथी छिछले छोकरों और