परंन्तु श्री रामकृष्ण देव के व्यक्तित्व में उनका समन्वय हो गया है।’’ (वही, पृष्ठ 401)
यहां प्रश्न उठ सकता है कि जब ईश्वर ही अवतार धारण करता है तो एक अवतार को दूसरे से-ईश्वर का ईश्वर से आगे अथवा प्रगतिशील होने का क्या अर्थ? विवेकानन्द ने इस प्रश्न का उत्तर भी दिया है। उन्होंने एक बार अपने एक शिष्य से कहा थाः
‘‘गुरू को लोग अवतार कह सकते हैं अथवा जो चाहे मानकर धारण करने की चेष्टा कर सकते हैं। परंतु भगवान का अवतार कहीं
परंन्तु श्री रामकृष्ण देव के व्यक्तित्व में उनका समन्वय हो गया है।’’ (वही, पृष्ठ 401)
यहां प्रश्न उठ सकता है कि जब ईश्वर ही अवतार धारण करता है तो एक अवतार को दूसरे से-ईश्वर का ईश्वर से आगे अथवा प्रगतिशील होने का क्या अर्थ? विवेकानन्द ने इस प्रश्न का उत्तर भी दिया है। उन्होंने एक बार अपने एक शिष्य से कहा थाः
‘‘गुरू को लोग अवतार कह सकते हैं अथवा जो चाहे मानकर धारण करने की चेष्टा कर सकते हैं। परंतु भगवान का अवतार कहीं