है।’ और यदि तुम ईसा से इसका प्रमाण मांगते तो निश्चय ही ईसा ने कहा होता, ‘लो, यह ईश्वर तुम्हारे सम्मुख खड़ा है, दर्शन कर लो।’ इस प्रकार हम देखते हैं कि इन महापुरूषों की ईश्वर-विषयक धारणा साक्षात् उपलब्धि, प्रत्यक्ष दर्शन पर आधारित है, तर्क जन्य नहीं।’’ (वही, सप्तम खंड, पृष्ठ 180)
और फिर लिखा हैः
‘‘ये महान शिक्षक इस पृथ्वी पर जीवंत ईश्वर रूप हैं इनके अतिरिक्त हम और किनकी उपासना करें? मैं अपने मन में ईश्वर की धारणा करने
है।’ और यदि तुम ईसा से इसका प्रमाण मांगते तो निश्चय ही ईसा ने कहा होता, ‘लो, यह ईश्वर तुम्हारे सम्मुख खड़ा है, दर्शन कर लो।’ इस प्रकार हम देखते हैं कि इन महापुरूषों की ईश्वर-विषयक धारणा साक्षात् उपलब्धि, प्रत्यक्ष दर्शन पर आधारित है, तर्क जन्य नहीं।’’ (वही, सप्तम खंड, पृष्ठ 180)
और फिर लिखा हैः
‘‘ये महान शिक्षक इस पृथ्वी पर जीवंत ईश्वर रूप हैं इनके अतिरिक्त हम और किनकी उपासना करें? मैं अपने मन में ईश्वर की धारणा करने