योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

का प्रयत्न करता हूं और अन्त में पाता हूं कि मेरी धारणा अत्यन्त क्षुद्र और मिथ्या है। वैसे ईश्वर की उपासना करना पाप होगा। फिर जब मैं अपनी आंखें खोलकर पृथ्वी की इन महान आत्माओं के चरित्र देखता हूं तो मुझे प्रतीत होता है कि ईश्वर विषयक मेरी उच्च से उच्चतर धारणा से भी वे कहीं उच्चतर और महान हैं।’’ (वि. सा., पृष्ठ, 181.182)

वेदान्त सिद्वांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य, चूंकि वह आत्मस्वरूप है, अपने को ‘शिवोऽहम’-मैं ईश्वर हूं


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का प्रयत्न करता हूं और अन्त में पाता हूं कि मेरी धारणा अत्यन्त क्षुद्र और मिथ्या है। वैसे ईश्वर की उपासना करना पाप होगा। फिर जब मैं अपनी आंखें खोलकर पृथ्वी की इन महान आत्माओं के चरित्र देखता हूं तो मुझे प्रतीत होता है कि ईश्वर विषयक मेरी उच्च से उच्चतर धारणा से भी वे कहीं उच्चतर और महान हैं।’’ (वि. सा., पृष्ठ, 181.182)

वेदान्त सिद्वांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य, चूंकि वह आत्मस्वरूप है, अपने को ‘शिवोऽहम’-मैं ईश्वर हूं


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