भोग-विलास आदि से हटाकर धीरे-धीरे भक्ति मार्ग पर ला
50 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
रहे थे। एक दिन परमहंस भक्तों से घिरे बैठे थे। नरेन्द्र भी मौजुद था। इधर-उधर की चर्चा और हंसी-मज़ाक हो रहा था कि वैष्णव धर्म की बात उठी। रामकृष्ण ने इ धर्म का सारतत्व बताते हुए कहा, ‘‘इस मत में तीन विषयों का पालन आवश्यक बताया गया है-नाम में रूचि, जीवन के प्रति दया और वैष्णव पूजा।’’ इसके बाद यह बताते हुए कि शिव ही का यह जग्त संसार है, ऐसी धारणा हृदय में रखकर,
भोग-विलास आदि से हटाकर धीरे-धीरे भक्ति मार्ग पर ला
50 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
रहे थे। एक दिन परमहंस भक्तों से घिरे बैठे थे। नरेन्द्र भी मौजुद था। इधर-उधर की चर्चा और हंसी-मज़ाक हो रहा था कि वैष्णव धर्म की बात उठी। रामकृष्ण ने इ धर्म का सारतत्व बताते हुए कहा, ‘‘इस मत में तीन विषयों का पालन आवश्यक बताया गया है-नाम में रूचि, जीवन के प्रति दया और वैष्णव पूजा।’’ इसके बाद यह बताते हुए कि शिव ही का यह जग्त संसार है, ऐसी धारणा हृदय में रखकर,