और फिर व्याख्या की, ‘‘आज ठाकुर से भावावेश में जैसा बताया, उससे जान गया हूं कि वन के वेदान्त को घर में लाया जा सकता है। सबसे पहले हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि ईश्वर ही जीव और जगत् के रूप में प्रकट होकर हमारे सामने विराजमान है। इसलिए शिवरूप जीवों की सेवा ही सबसे बड़ी भक्ति है।’’
फिर 3 जुलाई, 1897 को शरच्चन्द्र के नाम पत्र में उन्होंने इसी विचार को यों प्रस्तुत किया हैः
‘हमारा मूल तत्व प्रेम होना चाहिए, न कि दया। मुझे
और फिर व्याख्या की, ‘‘आज ठाकुर से भावावेश में जैसा बताया, उससे जान गया हूं कि वन के वेदान्त को घर में लाया जा सकता है। सबसे पहले हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि ईश्वर ही जीव और जगत् के रूप में प्रकट होकर हमारे सामने विराजमान है। इसलिए शिवरूप जीवों की सेवा ही सबसे बड़ी भक्ति है।’’
फिर 3 जुलाई, 1897 को शरच्चन्द्र के नाम पत्र में उन्होंने इसी विचार को यों प्रस्तुत किया हैः
‘हमारा मूल तत्व प्रेम होना चाहिए, न कि दया। मुझे