योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

तो ‘जीवों के प्रति दया’ शब्द विवेकरहित और व्यर्थ जान पड़ता है। हमारा धर्म करूणा नहीं, सेवा करना है।’’ (वि. सा., षष्टम खंड, पृष्ठ 340)

इन दिनों नरेन्द्र परमहंस के बताए उपाय से साधना कर रहा था। कभी-कभी वह पंचवटी के नीचे रात-रात भर ध्यान में लीन रहता। उसका यह अनुराग देख रामकृष्ण ने एक दिन उसे अपने पास बुलाकर कहा, ‘‘देख, कठिन साधना द्वारा मुझे अष्ट सिद्वियां मिली थी। उनका किसी दिन कोई उपयोग मैं तो कर नहीं पाया। तू ले ले, भविष्य में तेरे बहुत काम आएंगी।’’


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तो ‘जीवों के प्रति दया’ शब्द विवेकरहित और व्यर्थ जान पड़ता है। हमारा धर्म करूणा नहीं, सेवा करना है।’’ (वि. सा., षष्टम खंड, पृष्ठ 340)

इन दिनों नरेन्द्र परमहंस के बताए उपाय से साधना कर रहा था। कभी-कभी वह पंचवटी के नीचे रात-रात भर ध्यान में लीन रहता। उसका यह अनुराग देख रामकृष्ण ने एक दिन उसे अपने पास बुलाकर कहा, ‘‘देख, कठिन साधना द्वारा मुझे अष्ट सिद्वियां मिली थी। उनका किसी दिन कोई उपयोग मैं तो कर नहीं पाया। तू ले ले, भविष्य में तेरे बहुत काम आएंगी।’’


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